दर्द

 खुद से लड़ने वाले लोग जंग नहीं जीता करते। वो अपनों से हार जाते हैं। वो जब जंग लड़ते हैं तो इस बात का भी ख्याल रखने लगते हैं कि जिससे वो लड़ रहे हैं उन्हें तकलीफ न हो। खूब है ये तरीका किसी से हारने का भी कि उसकी जीत में न आप हार पाएं न जीत पाएं। बस तड़पते रहें।


मुझे खुद से लड़ना बिल्कुल पसन्द नहीं। जब अंदर ही अंदर आप अपने से लड़ के हार रहे होतें है तो दुनिया की किसी भी बात से आपको फ़र्क़ नही पड़ता। नए विश्व युध्द से भी, खुद की मौत से भी नहीं।

हमारे पास जब हारने को कुछ नहीं बचता तो हम अपना मन हार जाते हैं। ये स्थिति सबसे खराब होगी है। आपको हँसी नही आती। दुख भी नहीं। रियेक्ट होना बन्द हो जाता है जैसे। माथे पे कोई बोझ सा बैठ जाता है और दिल खाली।

मुझे जीने के पैमाने नही पता। पर अब मरने के पैमाने पता चलने लगे हैं। डिप्रेसन बस एक शब्द मात्र लगता है। शायद मैं निर्वात में चला जाता हूँ। आस पास की चीजें सुनाई नही देती। हम्म हम्म बस एक मात्र जवाब होता है। चाहे वो कोई सवाल हो या कोई बात। कुछ समझ ही नही आता।

खैर ये वक़्त भी कट ही जाता है। फ़र्क़ बस इतना होता है के वो मरने वाला पैमाना बस इसी समय समझ आता है। दुनिया की कोई दौलत किसी के माथे का बोझ नही हर सकती। न ही कोई साथ आपके भीतर की लहर को थाम सकता है।

झूठी हँसी, झूठी बातें और झूठी तसल्ली दुनिया में सबसे ज्यादा दर्द महसूस कराती हैं। दर्द। सर्दी में अंगूठे का किसी पत्थर में लड़ जाने वाला दर्द। या क़भीअचानक से पैर की हड्डी के खिसक जाने का दर्द, या मुस्कुरा के "सब ठीक है!" कहने का दर्द।

जिंदगी में दर्द और दर्द का अंतर तभी पता चलता है। खैर वक़्त का क्या है गुज़र जाता है। कल गुज़र गया था, आज गुज़र रहा है और कल भी गुज़र ही जाएगा। बस लड़ाई चलती रहेगी। कभी अपने से, कभी अपनों से, कभी गैरों से। हार जीत तो अंत में होती है पर जख्म? वो तो संघर्ष में लगते हैं।

मेरे लिए सबसे मुश्किल था चुनना और छोड़ना! सो मैंने "चुनना छोड़ना" चुना और इसीलिए आज न कुछ चुनने को बचा है और न ही कुछ छोड़ने को।


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